Friday, March 13, 2009
नोट बाटने के मायने
Monday, March 9, 2009
महिला संघर्ष की प्रतीक को नमन ...

पिछले दिनों महिला दिवस पर महिला सशक्तिकरण पर जम कर बातें हुयी । विभिन्न माध्यमों के के द्वारा महिलाओं की एक गुलाबी छवि प्रस्तुत की गई जिसमे यह बताया गया की महिलाएं तेजी से हर क्षेत्र में उभर रही है । समाचारपत्रों और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने कई महिलाओं के बारे में लिखा और दिखाया । महामहिम रास्ट्रपति ,कांग्रेस पार्टी की मुखिया सोनिया गाँधी ,सायना नेहवाल ,सानिया मिर्जा और इन्द्रा नूयी जैसी अनेको महिलाएं छायी रही । मुझे इससे कोई आपत्ति नही लेकिन इसी दिन एक महत्वपूर्ण घटना हुयी जिस पर मीडिया ने कोई सुध नही ली जिसका मुझे बेहद कष्ट है ।
पिछले ८ वर्षो से आमरण अनशन कर रही शर्मीला इरोम को न्यायालय ने प्रतीकात्मक रूप से बरी कर दिया । लेकिन कुछ समय बाद उन्हें फिर पुलिस कस्टडी में रख दिया गया । पूर्वोत्तर के बारे में दोहरा मापदंड अपनाने के कारन इसकी कोई चर्चा ही नही हुयी । यह बहुत दुर्भाग्य की बात है विश्व में अपने तरह का यह अनूठा संघर्ष है। फिर भी अधिकांश देशवासी इरोम के बारे में जानते ही नही । गाँधी के देश में जब उनके सामानों को भारत लाने की बात पर एक बहस छिडी है , ऐसी में उनके सिधान्तोको को आज भी जीवित रखने वली महिला पूरी तरह उपेक्षित है ।
मणिपुर की ३६ वर्षीया कवियत्री ,चित्रकार,और गाँधी वादी इरोम शर्मीला चानू ४ नवम्बर २००० से आमरण अनशन पर है । उनकी नाक में नली डालकर जबरजस्ती तरल पदार्थ दिया जा रहा है , जिससे वो जीवित रह सके। उनकी स्पस्ट मांग है, कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून १९५८ रद्द किया जाए ताकि पूर्वोत्तर में इस कानून के बर्बरता पूर्ण इस्तेमाल को रोका जा सके । इम्फाल से करीब १५ किलो मीटर दूर २ नवम्बर २००० को सुरक्षा बलों ने एक बस स्टाप पर खड़े निर्दोष लोगों पर गोलाबारी की जिसमे दस लोग मारे गए । इसी घटना के विरोध में इरोम ने भूख हड़ताल कर दिया। २१ नवम्बर को उसे 'आत्महत्या का प्रयास ' करने के आरोप में गिरिफ्तार कर दिया गया। उसे इम्फाल के ही जवाहर लाल नेहरू अस्पताल में भरती कराकर प्रशासन उसे जबरजस्ती नाक के रास्ते खिलाने लगा । इस घटना के ६ साल तक वह वही रही। न्यायिक हिरासत में रहते हुए उसने अपना अनशन तोड़ने या जमानत करने से इनकार कर दिया । जैसा की नियम है एक साल पूरा होने पर अदालत ने उसे रिहा कर दिया , क्योकि आत्महत्या के प्रयास के मामले में उसे अदिकतम एक साल की सज़ा दी जा सकती है । उसके बिना पानी के अनशन जारी रखने के कारण बार-बार रिहा होने के दो-तीन दिन के भीतर गिरिफ्तार कर लिया जाता था ।
२००६ में ३ अक्टूबर में अदालत ने उसे फिर बरी कर दिया ,जिसके अगले दिन शर्मीला ने सुरक्षा बलों को चकमा देते हुए मणिपुर से बहार निकल आई। इस मुद्दे पर राष्ट्र का ध्यान आकर्षित करने के लिए दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनशन जारी रखा। तीन दिन के बाद आधी रात को पुलिस ने पकड़कर एम्स में भरती करा दिया। और यह क्रम आज भी जारी है ...........सत्य और न्याय के लिए संघर्स करने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में यही अंजाम होगा यह विचार का प्रश्न है ? इरोम शर्मीला अपने अनशन से लोकतान्त्रिक व्यवस्था को मजबूत कर रही है ,आम जन मानस की इस प्रकरण पर चुप्पी खतरनाक भविष्य के संकेत दे रही है !
Saturday, March 7, 2009
महिला दिवस पर विशेष -

हर आँगन से उठती सिसकी
सदियों से खामोश है -
आँगन से आँगन तक के सफर में ।
गुजरती रहीं सदियाँ
तमाम उम्र के बेगार का अंत
सचमुच बहुत भयावह है ।
बचपन गुज़रा ,जवानी गुज़री
बुढापे तक अस्तित्व पर पर्दा ही पर्दा
देवी सी पूजी गई हो
या दासी सी तिरस्कृत रही हो ,
मनुष्य की पहचान से हमेशा महरूम रही ।
पत्थर -युग से कंप्यूटर तक का
सफर सफर तय कर चुका संसार
पर आधी दुनिया अभी तक
आँगन से आँगन तक के सफर में ही दफ़न है ।
Friday, March 6, 2009
बापू कि स्मृतियों के बहाने कुछ द्वंद
भारत के विजय माल्या ने इसे भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ते हुए बापू की सभी उपलब्ध वस्तुओं को ११ करोड़ में खरीदा । इसके पहले भी वो टीपू सुलतान की तलवार भारत ला चुके है ।
बापू के सामानों के नीचे उस अख़बार की प्रति जिसमें गाँधी जी की हत्या की ख़बर प्रकाशित हुई थी.
बापू की ये जेब घड़ी ज़ेनिथ कंपनी की है और संभवत: 1910 में बनी थी.
गांधी के चश्मे की भी नीलामी हुई. महात्मा गांधी का अपने चश्मों के बारे में कहना था," इन चश्मों से मैं आज़ाद भारत की तस्वीर देखता हूँ."
ये दावा किया गया है कि हत्या से पहले बापू ने आख़िरी बार इसी प्लेट-कटोरी में खाना खाया था.लेकिन प्रश्न यह है की बापू ने जिन दो आधारभूत सिद्धांतों की बात की थी उन पर कितना अमल हो रहा है । महात्मा गाँधी ने कहा था -
१) साधनों की सुचिता और
२)आचरण की पवित्रता
यही दो अमोध हथियार है जिन के बल पर रामराज्य की स्थापना हो सकती है । आज जब समाज में भ्रष्टाचार , हिंसा सहित नाना प्रकार की बुराईयाँ घर कर गई है ऐसे में हमें विचार करना होगा की क्या ? बापू से जुड़े सामानों की हमें आधिक चिंता है ,या उनके सिद्दांतो की ।
आज वैश्विक स्तर पर दो तरह की समस्याएं है -आतंकवाद और आर्थिक मंदी । दोनों का समाधान बापू के सिद्दांतो में है । आतंकवाद का कारण जिसके पास शक्ति है वो उसका दुरुपयोग कर रहा है । शक्तिशाली अमेरिका कमजोर देश जैसे इराक ,अफगानिस्तान को बरबाद कर रहा है । इसकी प्रतिक्रियात्मक हिंषा ही आतंकवाद है । वही दूसरी ओर आर्थिक मंदी का कारण आज की अर्थव्यवस्था का सट्टेबाजी आधारित होना है । भारत जैसे देश में जहाँ ६० प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर है वहां अर्थव्यवस्था कृषि आधारित होनी चाहिए , जिससे रोजगार के आधिक अवसर उत्पन्न हो । बापू ने कहा था कि मशीनीकरण तब तक उचित है जब तक उसे आदमी चलाये ,लेकिन जब यह आदमी को चलाने लगे तो समाज के लिए घातक हो जाएगा ।
आईये बापू के धरोहरों को लाने के साथ ही सत्य ,आहिंसा और सत्याग्रह को अंगीकार करने का एक सार्थक प्रयास कर समाज कि बेहतरी में अपना योगदान सुनिश्चित करें ।
Wednesday, March 4, 2009
असीम सहिबाबादी की रचना ...एक रिक्सावाले की व्यथा

अभी है पाँव कुछ छोटे नही आते है पैडल तक ,
Tuesday, March 3, 2009
उपचुनाव का झटका -मायावती हुयी "मुलायम"

उत्तर प्रदेश के भदोही विधानसभा उपचुनाव में बसपा की हार ने कई सवाल खड़ा किए है । पिछले दिनों समाजवादी पार्टी के रास्ट्रीय नेता और राज्य सभा सांसद के साथ मै दो दिन के चुनावी दौरे पर गया था। मैंने वहा सुरियावा ब्लाक के लगभग २५ गावों का दौरा किया । जिसमे कई बाते खुल कर सामने आई । इस उपचुनाव में दो लोगो की चर्चा सबसे आधिक थी - पड़ोस के सपा विधायक विजय मिश्रा जिनकी पत्नी भदोही की जिला पंचायत अद्यक्ष भी है । इनके बारे में कई तरह की चर्चाएँ थी , ये बाहुबली है और इनकी जिले में तूती बोलती है ऐसा लोगों का कहना था । विजय मिश्रा पर कई आपराधिक मुक़दमे लगे है । कुछ लोगो का कहना था कि बनारस के व्यापारी रुंगटा अपहरण में प्रयोग की गई गाड़ी इन्ही की थी । ९५ के लगभग भदोही में हुए शुक्ला वकील हत्याकांड में लिप्त राजपूत बाहुबली को जेल भिजवाने और उसपर कई मुक़दमे दायर करवाने के कारन विजय मिश्रा ब्रह्मण स्वाभिमान के प्रतीक बन गए । इस बार के उपचुनाव में सपा प्रत्याशी मधुबाला पासी को टिकट दिलवाने में विजय मिश्रा का ही योगदान था ।